Sunday, May 28

और दुःख अब नहीं झेलेगी माँ

अजीब सी लगती है 

अजीब सी लगती है 
सूरज की पहली लाली
जैसे करती हो इंतज़ार
मेरे आँखों के खुलने का 
और फिर बड़ी बेदर्दी से 
चौंधिया देने वाली रौशनी 
आँखों में झोंककर 
तसल्ली करती हो देखकर 
मेरे खुशियों की अर्थी 
जो उस शाम से निकली पड़ी है 
जब से मेरी माँ गुजरी है 

उस शाम की अब भी सुबह नहीं है 
फिर भी देखता हूँ 
हर दिन सूरज को उगते 
निर्लज़्ज़, निःसंकोच तरीके से, 
जिसकी इबादत में माँ ने
भूख, प्यास और नींद भी छोड़ी थी 

खुश लगता है ऊपरवाला भी 
जिंदगी लेकर,
जिसके हिस्से का प्रसाद 'भरपूर' 
माँ ने चढ़ाया था 
उसका पेट भी भर गया हो जैसे
इसलिए ठुकरा दिया बड़े शान से कहके, 
मुझे धरती पर अब तेरी जरूरत नहीं 

कितनी आसानी से कह दिया था 
डॉक्टर ने उस दिन 
तुम्हारी माँ अब नहीं रही 
जैसे कुछ हुआ न हो 
कोई पत्ता हिला न हो 

माँ कसम शरीर का हर कतरा रोया था 
चिता पर देख के उसका चेहरा आखिरी बार 
और शमशान घाट की 
पर भभकती आग की लपटों ने फिर ठंडक दी थी 
जैसे मुझसे कह रही हों 
चलो और दुःख अब नहीं झेलेगी माँ  | 

Part I

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