Sunday, January 15

निश्छल प्रेम


मत  कहो  हमसे हम  तुम्हारे  कुछ  भी  नहीं 
एक  बरसों  का  नाता  है  प्रेम  के  बंधन  का
रुठते  रहो   यूँही  कोई  शिकवा  नहीं
पर छोड़ के जाने  का  ख्याल  सपनों  से  भी  जुदा  करो |

कहाँ  पाओगे  हम  जैसा आशिक  कोई 
जो  तुम्हारी  ठोकर  को  भी  खुदा  की इनायत समझता हो 
तुम्हारी  जुदाई  को  दोजख  मानता हो |

दूर  जाओगे  तो  समझ पाओगे  हमारे  प्यार  को
अभी तुम क्या जानो हमारे निश्छल समर्पण  के  भाव  को ||

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