Sunday, May 6

मेरे कदम शबाब-ऐ- दहलीज़ पे,
तेरे हुस्न की क़यामत से बहक जाते हैं ।
जोर चलता नहीं इन बेताब हसरतों पे,
तेरी  शोख अदाओं पे जो ये फिसल जाते हैं।

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