Tuesday, June 5

'स्त्री'

स्त्री  कहलाती दुनिया में  त्याग  की मूर्ति,
अफ़सोस किसी  ने न सोचा,  क्या है इनकी सामाजिक स्थिति
कभी माँ तो कभी बेटी, कभी बहन तो कभी बीवी
 बन अनगिनत फर्जों को अदा ये करतीं  ।
 
पुरुषों की भावहीन दुनिया में करुणामयी प्रेम-रस  घोलती,
अनन्त अत्याचारों के बावजूद उफ़ तक न करती
कभी पति तो कभी पुत्र  सेवा में अपना सर्वेस्व उड़ेलती स्त्री ,
नि:स्वार्थ त्याग को जीवन धर्म मानती ।

क्यों निष्ठुर समाज न कभी समझ पाया  इनकी वृति
कि है अधिकार समान इनका भी, उतना ही  ही प्रेम नियति
'जगवालों संभल जाओ'  है  देती चेतावनी ये धरती
वरना विमुख रहोगे जीवनभर, न होगी होगी कभी तुम्हारे प्रेमाकांक्षाओं की पूर्ति ।।

 'शशांक'

सन्दर्भ: यह कविता 'सत्यमेव-जयते' नामक धारावाहिक से प्रेरित होकर लिखी गयी है । आज समाज को जरुरत है कि यह अपनी सोच का दायरा विस्तृत करे तथा स्त्रियों के प्रति उदारवादी नज़रिया अपनाए  ।

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