Sunday, December 15

तब क्यूं ओठों ने गुस्ताख तेरा नाम 'मोहब्बत' रख डाला था?
कमबख्त आज भी हर 'इश्क' में तेरा ही नाम याद आता है !
कुछ लम्हें ही तो थे गुफ्तगू के, हम दोनों के दरम्यां,
क्यूं फिर हर लम्हे में सिर्फ तेरा एहसास याद आता है ?

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