Tuesday, October 2

कभी तनहाइयाँ होती थीं शौकों में बिताने के लिए 
अब आदत है 'शौकों' की तनहाइयों भुलाने के लिए 
है मुजरिम वक़्त और गवाह भी बदलती इन फिजाओं का  
कि खुश होते थे कभी जो मिलके हमसे बेइन्तेहाँ  
वो ही लाख बहाने ढूँढते हैं 
अब हमसे नज़रे चुराने के लिए |

'शशांक'

No comments:

Post a Comment

कभी सोचता हूँ समेट दूँ तुम्हारी दास्ताँ कागचों पे अपने शब्दों के सहारे पर बैठता हूँ जब लिखने तुम्हें तो रुक जाता हूँ अब तुम ही बताओ ...