Tuesday, September 25

मैंने सोचा है
तुझे लम्हों में
हर पल, हर सुबह, हर शाम |

तुझे देखा है
ख्वाबों में
भोली, चंचल, कोमल सी
जैसे पहली बार मिली थी मुझसे
तू अजनबी, जुदा, बिलकुल अनजान |

मैं सोचता हूँ
आज भी
शिद्दत से तुझे
जैसे गहराइयों से मेरे दिल की
सिर्फ उठे है तेरा नाम |

मैं जानता हूँ
ये जो दूर से दिखते हैं
दो किनारों के मंजर,
धरती और अम्बर
नहीं मिलते हैं जीवनभर |

फिर भी चाहता हूँ
तुझे मैं
बेझिझक बेइनतहां
मोहब्बत की गुलपोश धरती पे
मिटाके अपना नामोनिशान |

'शशांक'

No comments:

Post a Comment

You taste good Not because you are But because you are forbidden From aspiration to obsession And then fatal compulsion That ...