Sunday, September 2

जैसे 'शब' का मुकद्दर हर रोज 'सहर'
मुझ पर भी कुछ ऐसा करे उनकी 'नज़र' |

'शशांक'

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कभी सोचता हूँ समेट दूँ तुम्हारी दास्ताँ कागचों पे अपने शब्दों के सहारे पर बैठता हूँ जब लिखने तुम्हें तो रुक जाता हूँ अब तुम ही बताओ ...